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रस क्या है: चार अवयव
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काव्य पढ़ने या सुनने से मन में जो आनन्द उत्पन्न होता है, वही रस है। आचार्य भरतमुनि के अनुसार विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भाव के संयोग से स्थायी भाव रस में बदल जाता है — 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः'। इस तरह रस के 4 अवयव (अंग) हैं।
| अवयव | अर्थ | उदाहरण (वात्सल्य) |
|---|---|---|
| स्थायी भाव | मन में स्थायी रूप से रहने वाला भाव, जो रस बनता है | संतान के प्रति स्नेह (वत्सल) |
| विभाव | भाव जगाने वाले कारण — आलम्बन (जिसके कारण भाव जगे) और उद्दीपन (जो भाव को बढ़ाए) | शिशु = आलम्बन; उसका घुटनों चलना = उद्दीपन |
| अनुभाव | भाव जगने पर आश्रय की शारीरिक चेष्टाएँ | माँ का मुस्कराना, निहाल होना |
| संचारी (व्यभिचारी) भाव | थोड़ी देर के लिए आने-जाने वाले भाव | हर्ष, चिन्ता, स्मृति |
Rule
संचारी भाव 33 माने जाते हैं — जैसे निर्वेद, ग्लानि, शंका, चिन्ता, हर्ष, स्मृति, गर्व, आवेग
आलम्बन के दो पक्ष: आश्रय (जिसके मन में भाव जगे) और विषय (जिसके प्रति भाव जगे)
अनुभाव के भेद: कायिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक (सात्त्विक अनुभाव 8 — स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु/कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय)
Remember
संख्याएँ: अवयव 4, संचारी भाव 33, सात्त्विक अनुभाव 8, स्थायी भाव मूलतः 9 (वात्सल्य और भक्ति जोड़कर 11)।
Common mistake
विभाव और अनुभाव को उलट देना। विभाव = कारण (पहले), अनुभाव = प्रतिक्रिया/चेष्टा (बाद में)।
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